2006  .सिविल न्यायालय की अधिकारिता और प्रक्रिया सिविल न्यायालय और राजस्व न्यायालय की अधिकारिता- 

(1) तत्समय प्रवृत्त किसी विधि में किसी बात के होते हुए परन्तु इस संहिता के उपबन्धों के अधीन रहते हुए कोई सिविल न्यायालय किसी मामले पर जिसमें राज्य सरकार, परिषद, कोई राजस्व न्यायालय या राजस्व अधिकारी, इस संहिता द्वारा या के अधीन अवधारण करने, निर्णय करने या निस्तारित करने के लिए सशक्त है, निर्णय प्राप्त करने के लिए कोई वाद, प्रार्थना पत्र या कार्यवाही पर विचार नहीं करेगा।
(2)  उपधारा  (1)  के  उपबन्धों  की  सामान्यता  पर  प्रतिकूल  प्रभाव  डाले  बिना  और  अभिव्यक्त  रूप  से  जैसा उपबंधित है उसके सिवाय या इस संहिता के अधीनः-
(क) कोई न्यायालय द्वितीय अनुसूची में विनिर्दिष्ट किसी भी मामले में अधिकारिता का प्रयोग नहीं करेगा; और
(ख) तृतीय अनुसूची के स्तम्भ 3 में विनिर्दिष्ट राजस्व न्यायालय या राजस्व अधिकारी से भिन्न कोई न्यायालय इसी अनुसूची के स्तम्भ  2  में विनिर्दिष्ट किसी वाद, प्रार्थना-पत्र  या  कार्यवाही  पर विचार नही करेगा।
(3) इस संहिता मे किसी बात के होते हुए भी किसी अपीलीय, पुनरीक्षण या निष्पादन न्यायालय द्वारा किसी ऐसी  आपत्ति  पर,  कि  उपधारा  (2)(ख)  में  उल्लिखित  किसी न्यायालय  या  अधिकारी  को  किसी  वाद, प्रार्थना-पत्र या कार्यवाही के सम्बन्ध में अधिकारिता थी या नहीं थी, तब तक विचार नहीं किया जायेगा जब तक  कि  ऐसी  आपत्ति,  प्रथम  बार  के  न्यायालय  या अधिकारी  के  समक्ष  शीघ्रतम  अवसर  पर  और  ऐसे  सभी मामलों  में जिसमें  वाद  बिन्दुओं  का  स्थिरीकरण  किया  जाता  हो,  वाद  बिन्दुओं के  स्थिरीकरण के समय या उसके पूर्व, न की गयी हो और जब तक कि न्याय परिणामिक रूप से असफल न हुआ हो।