निरसन-
(1) प्रथम अनुसूची में विनिर्दिष्ट अधिनियमन एतद्द्वारा निरसित किए जाते हैं।
(2) उपधारा (1) में किसी बात के होते हुए भी, ऐसे अधिनियमन के निरसन से निम्नलिखित पर प्रभाव नहीं पडे़गा-
(क) उत्तराखण्ड राज्य में ऐसे किसी अधिनियमन के लागू रहने पर;
(ख) किसी अधिनियमन के पूर्व प्रवर्तन या उसके अधीन सम्यक् रूप से की गयी या सहन की गयी किसी बात पर; या
(ग) कोई अन्य अधिनियमन जिसमें ऐसा अधिनियमन उपयोजित, सम्मिलित या निर्दिष्ट किया गया हो; या
(घ) पहले से कुछ भी किए गए या सहन किए गए कार्य की विधिमान्यता, अविधिमान्यता, प्रभाव या परिणाम या पहले से अर्जित, प्रोद्भूत या उपगत कोई अधिकार, हक या बाध्यता या दायित्व जिसमें विशेष रूप से सभी परिसम्पत्तियों को राज्य में निहित करना और इसमें सभी मध्यवर्तियों के सभी अधिकार, हक और हित को समाप्त करना सम्मिलित है; या इसके सम्बन्ध में कोई उपचार या कार्यवाही, या किसी ऋण का या से निर्मोचन या उन्मोचन, शास्ति, बाध्यता, दायित्व, दावा या मांग,
या पहले से स्वीकृत कोई क्षतिपूर्ति या विगत में किए गए किसी कार्य या वस्तु का सबूत; या
(ड.) विधि का कोई सिद्वान्त, नियम या स्थापित अधिकारिता, अभिवचन का रूप या माध्यम, प्रथा या प्रक्रिया या विद्यमान उपयोग, रूढ़ि, विशेषाधिकार, निर्बन्धन, छूट, पद या नियुक्तिः
परन्तु किसी ऐसे अधिनियमन के अधीन किसी कृत, कार्य या कार्यवाही को जिसमें बनाया गया कोई नियम, नियम संग्रह, निर्धारण, नियुक्तियाँ एवं अन्तरण जारी की गयी अधिसूचनाएं, सम्मन, नोटिस, वारण्ट और उद्घोषणा, प्रदत्त शक्ति, दिया गया पट्टा, नियम सीमा चिन्ह, तैयार किया गया अधिकार अभिलेख और अन्य अभिलेख अर्जित अधिकार और उपगत दायित्व भी सम्मिलित है; जहाँ तक वे इस संहिता के उपबन्धों से असंगत न हो, इस संहिता के तदनुरूप उपबन्धों के अधीन कृत कार्य या कार्यवाही समझा जायेगा और तदनुसार प्रवृत्त बना रहेगा जब तक कि इस संहिता के अधीन कृत किसी कार्य या कार्यवाही से अधिक्रमित न हो जाय।